*अमेरिका अकेले चीन का मुकाबला नहीं कर सकता, भारत समेत सहयोगियों की भूमिका अहम: एंटनी ब्लिंकन*
वाशिंगटन/नई दिल्ली। अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने कहा है कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में अमेरिका अकेले चीन का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने की स्थिति में नहीं है। उनका कहना है कि चीन की आर्थिक, औद्योगिक और विनिर्माण क्षमता लगातार बढ़ी है, इसलिए अमेरिका को भारत, यूरोप, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे सहयोगी देशों के साथ मिलकर रणनीति बनानी होगी।
ब्लिंकन ने कहा कि चीन का विनिर्माण क्षेत्र अमेरिका की तुलना में कहीं अधिक बड़ा हो चुका है। उनके अनुसार चीन के पास अधिक औद्योगिक उत्पादन क्षमता, जहाज निर्माण क्षमता, शोध प्रकाशन और पेटेंट हैं, जिससे वह वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूत स्थिति में पहुंच गया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, चीन जैसी चुनौती का अकेले सामना करना कठिन होगा।
पूर्व विदेश मंत्री ने कहा कि यदि अमेरिका, भारत, यूरोपीय देशों, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे साझेदार मिलकर काम करें तो चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित किया जा सकता है। उनके अनुसार इन देशों की संयुक्त आर्थिक क्षमता वैश्विक अर्थव्यवस्था का लगभग 50 से 60 प्रतिशत हिस्सा है, जो किसी भी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
ब्लिंकन ने अमेरिका की वैश्विक साख पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि दुनिया के कई देशों में अमेरिका के प्रति भरोसा पहले की तुलना में कम हुआ है और कुछ देश अब चीन को अधिक भरोसेमंद साझेदार के रूप में देख रहे हैं। उन्होंने जर्मनी समेत कई देशों में अमेरिका के प्रति बदलती धारणा का भी उल्लेख किया।
चीन-अमेरिका संबंधों पर बोलते हुए ब्लिंकन ने कहा कि दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा और सहयोग साथ-साथ चल रहे हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका चीन के साथ सीधे टकराव से बचना चाहता है, क्योंकि इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
इस बीच, अमेरिकी राजनीतिक विश्लेषक और जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय की प्रोफेसर क्रिस्टीन फेयर ने कहा कि पाकिस्तान की भारत के प्रति शत्रुता केवल कश्मीर मुद्दे तक सीमित नहीं है। उनके अनुसार पाकिस्तान का सैन्य प्रतिष्ठान भारत के बढ़ते क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव को अपनी सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती मानता है। उनका कहना है कि कश्मीर विवाद का समाधान होने के बाद भी पाकिस्तान की नीतियों में मूलभूत बदलाव की संभावना कम है।
उधर, भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर यह भी कहा जा रहा है कि दोनों देशों के बीच सहयोग, वैश्विक सुरक्षा, आर्थिक विकास, प्रौद्योगिकी और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे क्षेत्रों में आगे भी महत्वपूर्ण बना रहेगा। हालांकि, भारत में शासन परिवर्तन या उससे जुड़े किसी भी दावे अथवा राजनीतिक टिप्पणी की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।







