*_तमिलनाडु के राज्यपाल का विधानसभा से वॉकआउट, राष्ट्रगान के मुद्दे पर स्टालिन सरकार से तकरार_*
चेन्नई: तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि सोमवार को विधानसभा सत्र के पहले दिन सदन से बाहर चले गए. उनका आरोप था कि कार्यवाही शुरू होने पर राष्ट्रगान नहीं बजाया गया. विधानसभा की पुरानी परंपरा के अनुसार, सत्र की शुरुआत ‘तमिल थाई वाजथु’ (तमिल गान) के साथ हुई. इससे नाराज होकर राज्यपाल ने अपना पारंपरिक भाषण नहीं दिया और आने के कुछ ही देर बाद सदन से बाहर निकल गए.
यह लगातार तीसरा साल है जब राज्यपाल रवि ने विधानसभा में अपना संबोधन नहीं दिया है. पिछले मौकों पर भी उन्होंने कहा था कि उनका यह फैसला सत्र की शुरुआत में राष्ट्रगान न बजाए जाने के कारण था.
राजभवन ने विधानसभा छोड़ने के राज्यपाल के फैसले पर स्पष्टीकरण देते हुए एक बयान जारी किया. सोशल मीडिया एक्स पर जारी बयान के अनुसार, राज्यपाल ने अपना भाषण न देने और सदन से बाहर जाने के पीछे 13 कारणों का हवाला दिया.
राज्यपाल का माइक बार-बार बंद कर दिया गया और उन्हें बोलने नहीं दिया गया.
भाषण में कई ऐसे दावे हैं जिनका कोई आधार नहीं है और कई बयान भ्रामक हैं. जनता को परेशान करने वाले कई महत्वपूर्ण मुद्दों को नजरअंदाज किया गया है.
यह दावा कि राज्य ने 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक का भारी निवेश आकर्षित किया है, सच्चाई से कोसों दूर है. संभावित निवेशकों के साथ किए गए कई समझौते (MoUs) केवल कागजों पर ही रह गए हैं. वास्तविक निवेश इसका बहुत छोटा हिस्सा है. निवेश के आंकड़े बताते हैं कि तमिलनाडु निवेशकों के लिए कम आकर्षक होता जा रहा है. चार साल पहले तक, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) प्राप्त करने वाले राज्यों में तमिलनाडु चौथे स्थान पर था, लेकिन आज यह छठे स्थान पर बने रहने के लिए संघर्ष कर रहा है.
महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे को पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया है, जबकि पॉक्सो (POCSO) रेप की घटनाओं में 55% से अधिक और महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की घटनाओं में 33% से अधिक की चिंताजनक वृद्धि हुई है.
नशीले पदार्थों और ड्रग्स का बड़े पैमाने पर फैला होना और स्कूली छात्रों सहित युवाओं में ड्रग्स के बढ़ते मामले गंभीर चिंता का विषय हैं. एक साल में ड्रग्स के कारण 2000 से ज्यादा लोगों (जिनमें ज्यादातर युवा थे) ने आत्महत्या की. यह हमारे भविष्य को गंभीर खतरे में डाल रहा है.
दलितों के खिलाफ अत्याचार और दलित महिलाओं के साथ यौन हिंसा के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. फिर भी, इसे पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया है.
हमारे राज्य में एक साल में लगभग 20,000 लोगों ने आत्महत्या की- यानी हर दिन लगभग 65 आत्महत्याएं. देश में कहीं भी स्थिति इतनी भयावह नहीं है. तमिलनाडु को अब ‘भारत की आत्महत्या की राजधानी’ कहा जा रहा है. फिर भी, ऐसा लगता है कि सरकार को इसकी कोई चिंता नहीं है. इसे अनदेखा कर दिया गया है.
शिक्षा के स्तर में लगातार गिरावट आ रही है और शिक्षण संस्थानों में कुप्रबंधन फैला हुआ है, जिससे हमारे युवाओं का भविष्य बुरी तरह प्रभावित हो रहा है. 50% से अधिक शिक्षकों के पद सालों से खाली पड़े हैं और पूरे राज्य में गेस्ट फैकल्टी (अतिथि शिक्षक) अशांत हैं. हमारे युवा अनिश्चित भविष्य की ओर देख रहे हैं. ऐसा लगता है कि सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा और इस मुद्दे को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है.
कई हज़ार ग्राम पंचायतें निष्क्रिय हैं क्योंकि सालों से चुनाव नहीं हुए हैं. वे सीधे सरकारी विशेष अधिकारियों के अधीन हैं. करोड़ों लोगों को जमीनी लोकतंत्र के उनके अधिकारों से वंचित किया जा रहा है. यह संविधान की भावना के खिलाफ है। लोग ग्राम पंचायतों की बहाली का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. हालांकि, भाषण में इसका जिक्र तक नहीं है.
राज्य के कई हज़ार मंदिर बिना ‘बोर्ड ऑफ ट्रस्टी’ के हैं और सीधे राज्य सरकार द्वारा प्रशासित किए जा रहे हैं. मंदिरों के कुप्रबंधन से करोड़ों श्रद्धालु गहरे आहत और निराश हैं. प्राचीन मंदिरों की बहाली और संरक्षण पर माननीय मद्रास उच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण निर्देशों को 5 साल बाद भी लागू नहीं किया गया है. श्रद्धालुओं की भावनाओं को बेरहमी से नजरअंदाज किया गया है.
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र उद्योग चलाने की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लागतों के कारण भारी तनाव में हैं. यह क्षेत्र रोजगार और विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. हालांकि, देश में 5.5 करोड़ से अधिक पंजीकृत MSMEs के मुकाबले तमिलनाडु में केवल 40 लाख के करीब हैं, जबकि यहां विकास की अपार संभावनाएं हैं. तमिलनाडु के उद्यमियों को अपने उद्यम दूसरे राज्यों में लगाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. इस मुद्दे को नजरअंदाज किया गया है.
लगभग सभी क्षेत्रों में निचले स्तर के कर्मचारियों के बीच व्यापक असंतोष है. वे अशांत और निराश हैं. उनकी वास्तविक शिकायतों को दूर करने के तरीकों का कोई उल्लेख नहीं है.
राष्ट्रगान का एक बार फिर अपमान किया गया है और मौलिक संवैधानिक कर्तव्य की अवहेलना की गई है.
बाद में विधानसभा अध्यक्ष एम. अप्पावु ने सदन को बताया कि राज्यपाल ने इस बात पर जोर दिया था कि सत्र की शुरुआत राष्ट्रगान से होनी चाहिए. हालांकि, अध्यक्ष ने कहा कि उन्होंने स्पष्ट किया कि विधानसभा अपनी स्थापित प्रक्रिया का पालन कर रही है, जिसके तहत परंपरागत रूप से पहले ‘तमिल थाई वाजथु’ गाया जाता है. अप्पावु ने कहा कि राज्यपाल ने इस स्पष्टीकरण को स्वीकार नहीं किया और सदन से बाहर चले गए.
इसके बाद, मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने राज्यपाल के इस कदम की कड़ी आलोचना की. उन्होंने कहा कि सदन से बाहर जाना विधानसभा का अपमान है, जिसका अपना एक सौ साल से भी पुराना इतिहास और परंपरा रही है.
पूर्व मुख्यमंत्री सी.एन. अन्नादुरई का जिक्र करते हुए स्टालिन ने कहा कि हालांकि अन्ना ने एक बार राज्यपाल के पद की जरूरत पर सवाल उठाया था, लेकिन जब तक यह पद है, उन्होंने हमेशा इसकी गरिमा और मर्यादा का सम्मान किया. स्टालिन ने आगे कहा कि मौजूदा राज्यपाल विधानसभा के प्रति वैसा सम्मान दिखाने में विफल रहे हैं.
इसके बाद मुख्यमंत्री ने एक प्रस्ताव पेश किया जिसमें कहा गया कि राज्यपाल के सदन से बाहर जाने के बावजूद उनके भाषण को पढ़ा हुआ माना जाए. सदन ने इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित कर दिया. अध्यक्ष अप्पावु ने आगे घोषणा की कि विधानसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में केवल राज्यपाल के भाषण का टेक्स्ट (मूल पाठ) शामिल किया जाएगा और उस दिन की किसी अन्य कार्यवाही को रिकॉर्ड में नहीं लिया जाएगा.







