*अर्थव्यवस्था की रीढ़ ट्रांसपोर्ट सेक्टर संकट में, बढ़ती लागत और मिलावटी ईंधन से अस्तित्व पर सवाल*

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*अर्थव्यवस्था की रीढ़ ट्रांसपोर्ट सेक्टर संकट में, बढ़ती लागत और मिलावटी ईंधन से अस्तित्व पर सवाल*

नई दिल्ली। देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर लगातार बढ़ते आर्थिक दबाव ने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। बीते 10-12 वर्षों के दौरान नोटबंदी, कोरोना काल, जीएसटी व्यवस्था और अन्य आर्थिक बदलावों का असर लघु एवं मध्यम उद्योगों के साथ-साथ परिवहन व्यवसाय पर भी पड़ा है। अब बढ़ती परिचालन लागत, महंगे टोल टैक्स, घटते मालभाड़े और कथित रूप से मिलावटी ईंधन की समस्या ने वाहन मालिकों की चिंता और बढ़ा दी है।

ट्रांसपोर्ट व्यवसाय से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से करोड़ों लोगों की आजीविका जुड़ी हुई है। माल लेकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने वाले वाहन चालकों और मालिकों को रास्ते में टोल टैक्स, परिवहन विभाग की औपचारिकताओं, पुलिस जांच और अन्य खर्चों का सामना करना पड़ता है। दूसरी ओर मालभाड़े में अपेक्षित वृद्धि न होने से वाहन मालिकों का मुनाफा लगातार कम होता जा रहा है।

ट्रांसपोर्ट कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि डीजल-पेट्रोल की कीमतों, टोल शुल्क, रखरखाव और अन्य खर्चों में लगातार बढ़ोतरी हुई है, जबकि परिवहन किराए में उसी अनुपात में वृद्धि नहीं हो सकी। इससे छोटे और मध्यम वाहन मालिकों की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर हो रही है।

व्यवसायियों का आरोप है कि सरकार द्वारा लागू की गई विभिन्न नीतियों और बढ़ते अनुपालन बोझ ने पहले से ही दबाव झेल रहे परिवहन क्षेत्र की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। उनका कहना है कि जिस क्षेत्र को देश की आर्थिक गतिविधियों की जीवनरेखा माना जाता है, उसे पर्याप्त राहत और संरक्षण की आवश्यकता है।

अब ईंधन में एथेनॉल मिश्रण को लेकर भी ट्रांसपोर्ट कारोबारियों में चिंता बढ़ रही है। उनका कहना है कि ईंधन की गुणवत्ता और वाहनों की क्षमता को ध्यान में रखते हुए सरकार को एथेनॉल ब्लेंडिंग नीति की समीक्षा करनी चाहिए। हालांकि इस संबंध में वैज्ञानिक और तकनीकी मानकों के आधार पर स्पष्ट स्थिति सामने आना जरूरी है।

ट्रांसपोर्ट कारोबारियों ने सरकार से टोल शुल्क, ईंधन की गुणवत्ता, बढ़ती परिचालन लागत और नियामकीय प्रक्रियाओं पर पुनर्विचार करते हुए राहत पैकेज तथा व्यावहारिक नीतियां बनाने की मांग की है। उनका कहना है कि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो देश की अर्थव्यवस्था से सीधे जुड़े इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में संकट और गहरा सकता है।


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