*भारत-जर्मनी के बीच जल्द होगी 90 हजार करोड़ की पनडुब्बी डील*
*भारतीय नौसेना के लिए छह अत्याधुनिक पारंपरिक पनडुब्बियों का भारत में होगा निर्माण, जर्मन तकनीक के साथ घरेलू रक्षा उद्योग को मिलेगा बढ़ावा*
नई दिल्ली। भारत और जर्मनी के बीच भारतीय नौसेना के लिए छह अत्याधुनिक पारंपरिक पनडुब्बियों के निर्माण को लेकर करीब 90 हजार करोड़ रुपये से अधिक की बड़ी रक्षा डील जल्द होने की उम्मीद है। जर्मनी की थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (टीकेएमएस) और भारत की सरकारी कंपनी मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड के बीच इस परियोजना को लेकर समझौता प्रस्तावित है। जर्मनी के भारत में राजदूत फिलिप एकरमैन ने भी दोनों देशों के बीच समझौते पर जल्द हस्ताक्षर होने की उम्मीद जताई है।
परियोजना के तहत पनडुब्बियों का निर्माण भारत में किए जाने पर जोर रहेगा। इससे देश की स्वदेशी जहाज निर्माण क्षमता को बढ़ावा मिलने के साथ ही रक्षा क्षेत्र में तकनीक हस्तांतरण, स्थानीयकरण और भारतीय कंपनियों की भागीदारी बढ़ने की संभावना है। भारत का लक्ष्य केवल पनडुब्बियों का निर्माण करना ही नहीं, बल्कि उनके रखरखाव, आधुनिकीकरण और भविष्य में डिजाइन क्षमता विकसित करना भी है।
एआईपी तकनीक से बढ़ेगी क्षमता
प्रस्तावित पनडुब्बियों में वायु-स्वतंत्र प्रणोदन (एआईपी) तकनीक शामिल होने की उम्मीद है। यह तकनीक पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को लंबे समय तक पानी के भीतर संचालन में सक्षम बनाती है। पनडुब्बियों में आधुनिक सेंसर, हथियार और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियां जैसी उन्नत क्षमताएं शामिल किए जाने की संभावना है।
भारतीय उद्योग को भी मिलेगा अवसर
परियोजना के तहत टीकेएमएस भारतीय कंपनियों के साथ औद्योगिक साझेदारी विकसित कर रही है। भारी टॉरपीडो के निर्माण और आधुनिकीकरण से जुड़े क्षेत्र में वीईएम टेक्नोलॉजीज के साथ साझेदारी की जानकारी सामने आई है। वहीं, मुंबई की सीएफएफ फ्लुइड कंट्रोल के साथ पनडुब्बी-रोधी युद्ध प्रणालियों से संबंधित सहयोग की दिशा में भी काम किया जा रहा है। इससे देश में रक्षा विनिर्माण का स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र मजबूत होने की उम्मीद है।
नौसैनिक ताकत बढ़ाने पर जोर
भारतीय नौसेना के पारंपरिक पनडुब्बी बेड़े को मजबूत करने और हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती समुद्री चुनौतियों के बीच इस परियोजना को रणनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है। पनडुब्बियों के भारत में निर्माण से नौसेना की परिचालन क्षमता के साथ-साथ रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता को भी बल मिलेगा।
वहीं, भारतीय नौसेना में औसतन हर 40 दिन में एक स्वदेशी युद्धपोत या पनडुब्बी शामिल किए जाने की बात देश की बढ़ती जहाज निर्माण क्षमता को रेखांकित करती है। सरकार के मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत घरेलू रक्षा उत्पादन, तकनीकी क्षमता, रोजगार और भविष्य में रक्षा निर्यात को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है।











