नारायण दत्त तिवारी की दूरदर्शिता ने दिया विकास को नया आयाम, आज भी प्रासंगिक उनके विचार
रुद्रपुर/देहरादून। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी की कार्यशैली और विचारधारा आज भी प्रदेश के विकास के संदर्भ में प्रेरणास्रोत बनी हुई है। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में शालीनता और संयम को प्राथमिकता देते हुए विरोधियों के बीच भी सम्मान अर्जित किया।
मुख्यमंत्री के रूप में तिवारी का प्रमुख लक्ष्य प्रदेश के स्थानीय युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराना था, ताकि वे अपने ही राज्य में रहकर अपने सपनों को साकार कर सकें। इसी दिशा में उन्होंने टनकपुर से सहारनपुर बॉर्डर तक औद्योगिक विकास की व्यापक रूपरेखा तैयार की। उनकी पहल पर स्थानीय युवाओं के लिए 70 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित किया गया, जिससे रोजगार के नए अवसर सृजित हुए।
इसके साथ ही, तिवारी ने मजबूत शिक्षा नीति पर भी जोर दिया, ताकि प्रदेश की आने वाली पीढ़ी को बेहतर भविष्य मिल सके। उनका मानना था कि यदि पहाड़ के लोगों को उनके आसपास ही रोजगार और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराई जाए, तो पलायन की समस्या को काफी हद तक रोका जा सकता है।
हालांकि, बदलती सरकारों के दौरान उनकी कई दूरदर्शी योजनाओं को अपेक्षित गति नहीं मिल सकी, जिसके चलते उत्तराखंड आज भी पलायन जैसी गंभीर समस्या से जूझ रहा है। तिवारी के बाद प्रदेश की राजनीति में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के बढ़ते प्रभाव ने विकास की रफ्तार को प्रभावित किया।
ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान समय में कांग्रेस को अपनी संगठनात्मक क्षमता को मजबूत करते हुए प्रदेशहित में ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। ‘संगठित कांग्रेस, मजबूत प्रदेश’ के नारे के साथ पार्टी को आगे बढ़कर उत्तराखंड के समग्र विकास की दिशा में कार्य करना होगा।







