*संघर्ष, दूरदृष्टि और जनसेवा की मिसाल थे पर्वत पुत्र नारायण दत्त तिवारी*
*डॉ. गणेश उपाध्याय ने पुण्यतिथि पर किया स्मरण, युवाओं से तिवारी के जीवन से प्रेरणा लेने का आह्वान*
रुद्रपुर। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय पंडित नारायण दत्त तिवारी का जीवन संघर्ष, दृढ़ संकल्प, दूरदृष्टि और जनसेवा की प्रेरणादायक मिसाल है। उनका राजनीतिक सफर बताता है कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद शिक्षा, परिश्रम और जनसेवा के संकल्प के बल पर सफलता के शिखर तक पहुंचा जा सकता है। उत्तराखंड कांग्रेस के महामंत्री एवं कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष डॉ. गणेश उपाध्याय ने पर्वत पुत्र नारायण दत्त तिवारी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए युवाओं से उनके जीवन से प्रेरणा लेने का आह्वान किया।
डॉ. उपाध्याय ने कहा कि 18 अक्टूबर 1925 को कुमाऊं की धरती पर जन्मे नारायण दत्त तिवारी का जीवन देशभक्ति और संघर्ष की भावना से प्रेरित रहा। उनके पिता पूर्णानंद तिवारी स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े थे। इसी परिवेश में तिवारी जी के भीतर राष्ट्रप्रेम और जनसेवा की भावना विकसित हुई। वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया और करीब 15 महीने जेल में बिताने पड़े।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के बावजूद तिवारी जी ने शिक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखी। जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 1947 में विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष बने। इसके बाद वर्ष 1952 में विधायक बनने के साथ उनका राजनीतिक सफर आगे बढ़ा। उन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और केंद्र सरकार में भी विभिन्न महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं।
डॉ. उपाध्याय ने कहा कि नारायण दत्त तिवारी की सबसे बड़ी उपलब्धियों में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड, दोनों राज्यों का मुख्यमंत्री बनना शामिल है। उत्तराखंड राज्य गठन के बाद वर्ष 2002 में उन्होंने मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली और वर्ष 2007 तक प्रदेश का नेतृत्व किया। उनके कार्यकाल में औद्योगिक निवेश, रोजगार सृजन और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के प्रयास किए गए। पंतनगर, रुद्रपुर और हरिद्वार सहित विभिन्न क्षेत्रों में औद्योगिक विकास को गति देने में उनके योगदान को आज भी याद किया जाता है।
उन्होंने कहा कि तिवारी जी को ‘पर्वत पुत्र’ के रूप में याद करना उत्तराखंड की मिट्टी, संस्कृति और जनभावनाओं के प्रति उनके जुड़ाव का सम्मान है। पहाड़ की धरती से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने तक का उनका सफर युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है।
डॉ. उपाध्याय ने कहा कि तिवारी जी को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब राज्य में रोजगार के अवसर बढ़ाने, पलायन रोकने, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने तथा गांवों तक विकास पहुंचाने के लिए गंभीरता से प्रयास किए जाएंगे। उन्होंने युवाओं से संघर्षों से न घबराने, शिक्षा को प्राथमिकता देने और जनसेवा के मार्ग पर आगे बढ़ने की अपील की।
उन्होंने कहा कि एक स्वतंत्रता सेनानी से लेकर छात्रसंघ अध्यक्ष, विधायक, केंद्रीय मंत्री और दो राज्यों के मुख्यमंत्री तक का सफर नारायण दत्त तिवारी की असाधारण नेतृत्व क्षमता और दृढ़ इच्छाशक्ति को दर्शाता है। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों को निरंतर परिश्रम, सामाजिक जिम्मेदारी और जनकल्याण के लिए समर्पित रहने की प्रेरणा देता रहेगा।
अंत में डॉ. गणेश उपाध्याय ने स्वर्गीय पंडित नारायण दत्त तिवारी को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके आदर्शों पर चलने और उत्तराखंड को विकास, रोजगार, शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में आगे बढ़ाने का संकल्प लेने का आह्वान किया।


