*_पश्चिम बंगाल डीजीपी नियुक्ति मामला : यूपीएससी ने कहा, ‘आपको जाना पड़ेगा सुप्रीम कोर्ट’_*
कोलकाता : पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राज्य में डीजीपी की नियुक्ति के लेकर कानूनी और प्रशासनिक संकट उत्पन्न हो गया है. संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) ने नामों की उस सूची को लौटा दिया है, जिसे राज्य सरकार ने सौंपा था. यूपीएससी ने इस मामले पर प.बंगाल सरकार को सुप्रीम कोर्ट से स्पष्टीकरण प्राप्त करने को कहा है.
यूपीएससी के निदेशक नंद किशोर कुमार ने 31 दिसंबर 2025 को प.बंगाल सरकार को एक पत्र लिखा था. इसमें उन्होंने साफ तौर पर कहा कि डीजीपी की नियुक्ति को लेकर राज्य सरकार ने “असामान्य और बिना वजह की देरी” की है. इसलिए इन हालात को देखते हुए यूपीएससी आगे की प्रक्रिया नहीं बढ़ा सकती है, बेहतर होगा कि आप सुप्रीम कोर्ट से पूरे मामले पर उनकी सलाह मांगें.
इस विवाद की जड़ में प्रकाश सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला है. यूपीएससी ने अपने पत्र में कहा है कि प.बंगाल में डीजीपी का पद 28 दिसंबर 2023 को रिक्त हो गया था. सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशानुसार राज्य सरकार को इस तिथि से कम से कम तीन महीने पहले योग्य उम्मीदवारों की सूची यूपीएससी को सौंपनी थी. यह फैसला प्रकाश सिंह मामले में दिया गया था, लेकिन राज्य सरकार ने इसकी अनदेखी की.
बड़ी देरी के बावजूद, यूपीएससी ने 30 अक्टूबर, 2025 को एम्पेनलमेंट कमेटी की एक मीटिंग बुलाई. हालांकि, देर से सबमिशन के कारण, कमेटी के सदस्यों के बीच वैकेंसी की असली तारीख और एम्पेनलमेंट की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की कानूनी वैधता को लेकर गंभीर मतभेद पैदा हो गए. इस अनिश्चितता का सामना करते हुए, यूपीएससी ने भारत के अटॉर्नी जनरल से कानूनी राय मांगी.
अटॉर्नी जनरल की राय राज्य सरकार के लिए बहुत ज्यादा परेशानी वाली साबित हुई. उनके ऑब्जर्वेशन का हवाला देते हुए, यूपीएससी के लेटर में कहा गया है, “पैनल बनाने के लिए प्रपोजल भेजने में राज्य सरकार की तरफ से हुई देरी बहुत ज्यादा है. लागू नियमों और पिछले मामलों की जांच करने पर, मुझे ऐसा कोई प्रावधान नहीं मिला जो यूपीएससी को इतनी अधिक देरी को माफ करने और ऐसा आगे बढ़ने की अनुमति दे.”
उन्होंने आगे चेतावनी दी कि राज्य के प्रस्ताव को मानने से गंभीर विसंगतियां पैदा होंगी, क्योंकि वैकेंसी की देरी से रिपोर्टिंग के कारण योग्य अधिकारियों को पैनल में शामिल होने के लिए विचार किए जाने का उचित मौका नहीं मिल पाएगा. अटॉर्नी जनरल ने इस बात पर भी जोर दिया कि अगर राज्य सरकार को कोई दिक्कत हो रही थी, तो उसे पहले ही कोर्ट जाना चाहिए था. लेटर में कहा गया है, “किसी भी दिक्कत की स्थिति में, राज्य सरकार को सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट से संपर्क करना चाहिए था. इसलिए, सबसे सही तरीका यह होगा कि राज्य सरकार माननीय सुप्रीम कोर्ट से अनुमति या स्पष्टीकरण मांगे.”
विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ, पुलिस प्रमुख की नियुक्ति को लेकर यह प्रशासनिक गतिरोध राज्य सरकार के लिए एक बड़ा झटका है. अब सबकी नजर इस बात पर है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के सामने डेढ़ साल की देरी को कैसे सही ठहराती है और क्या वह सुप्रीम कोर्ट से राहत पाने में कामयाब होती है.






