*_’महंगाई भत्ता कर्मचारियों का कानूनी अधिकार है, बोनस नहीं’: सुप्रीम कोर्ट_*
नई दिल्लीः ‘महंगाई भत्ता कर्मचारियों का कानूनी अधिकार है. यह कोई अतिरिक्त फायदा (बोनस) नहीं है, बल्कि इसलिए दिया जाता है ताकि लोग महंगाई के दौर में अपना गुजारा सही ढंग से कर सकें.’ सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को पश्चिम बंगाल से जुड़े एक मामले में सुनवाई के दौरान यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है.
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने पश्चिम बंगाल सरकार को आदेश दिया कि वह अपने कर्मचारियों को साल 2008 से 2019 तक का बकाया महंगाई भत्ता चुकाए. अदालत ने यह भी साफ किया कि जो कर्मचारी इस केस के चलने के दौरान रिटायर हो चुके हैं, उन्हें भी इस फैसले के तहत पूरा लाभ मिलेगा.
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को आदेश दिया है कि वह 6 मार्च तक कर्मचारियों के बकाया महंगाई भत्ते (DA) का 25 प्रतिशत हिस्सा चुका दे. कोर्ट ने कहा कि महंगाई भत्ता पाना पश्चिम बंगाल के कर्मचारियों का एक कानूनी अधिकार है. बेंच ने स्पष्ट किया कि राज्य के कर्मचारी साल 2008 से 2019 के बीच के अपने पूरे बकाये को पाने के हकदार हैं.
अदालत ने सरकार से कहा है कि पहली किस्त का भुगतान करने के बाद वह इसकी स्टेटस रिपोर्ट कोर्ट में जमा करे. इस आदेश का पालन हुआ है या नहीं, इसे देखने के लिए कोर्ट अब 15 अप्रैल को अगली सुनवाई करेगा.
भुगतान से जुड़े वित्तीय बोझ और जटिलताओं को देखते हुए, शीर्ष अदालत ने एक समिति का गठन किया है. इस समिति में ये सदस्य शामिल हैं:
जस्टिस इंदू मल्होत्रा: सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश
जस्टिस तरलोक सिंह चौहान: हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश
जस्टिस गौतम भादुड़ी: हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) या उनके द्वारा नामित कोई वरिष्ठ अधिकारी
सुप्रीम कोर्ट ने समिति को निर्देश दिया कि वह राज्य अधिकारियों के साथ मिलकर भुगतान की जाने वाली कुल राशि तय करे, भुगतान का शेड्यूल (समय-सारणी) बनाए और समय-समय पर यह जांच करे कि राशि का भुगतान सही ढंग से हो रहा है या नहीं.
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि समिति द्वारा राशि तय किए जाने के बाद, पहली किस्त का भुगतान 31 मार्च 2026 तक कर दिया जाना चाहिए. इस मामले से जुड़े वकीलों के अनुसार, महंगाई भत्ते (DA) का कुल बकाया करीब 41,000 करोड़ रुपये है.
इस मामले की शुरुआत तब हुई जब पश्चिम बंगाल सरकार के कर्मचारियों के एक समूह ने कलकत्ता हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. उनकी मांग थी कि उन्हें केंद्र सरकार के कर्मचारियों के समान दर पर डीए और पिछला बकाया दिया जाए. हाई कोर्ट ने मई 2022 में कर्मचारियों के हक में फैसला सुनाया और राज्य को अपने DA को सेंट्रल रेट के बराबर करने का निर्देश दिया.
पश्चिम बंगाल सरकार ने नवंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट में अपील करके हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी. अप्रैल 2025 तक, केंद्र सरकार के कर्मचारियों को 55 परसेंट DA मिलता है, जबकि पश्चिम बंगाल के कर्मचारियों को हाल ही में 4 परसेंट की बढ़ोतरी के बावजूद सिर्फ 18 परसेंट मिलता है.






