*_भारत ने 2025 में 357 मिलियन टन खाद्यान्न उत्पादन के साथ ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाया: पीएम मोदी_*

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*_भारत ने 2025 में 357 मिलियन टन खाद्यान्न उत्पादन के साथ ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाया: पीएम मोदी_*

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को कहा कि भारत ने 2025 में 357 मिलियन टन अनाज पैदा करके एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाया है. ये देश की खेती के विकास में एक अहम मील का पत्थर होगा.

अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम मन की बात के 128वें एपिसोड में देश को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि पिछले दस सालों में भारत का खाद्यान्न उत्पादन 100 मिलियन टन बढ़ा है. ये खेती में आत्मनिर्भरता की तरफ देश की लगातार बढ़ती रफ्तार को दिखाता है.

पीएम मोदी ने कहा, ‘भारत ने कृषि क्षेत्र में बड़ी कामयाबी हासिल की है. भारत ने 357 मिलियन टन अनाज पैदा करके एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाया है. 10 साल पहले के मुकाबले, भारत का अनाज प्रोडक्शन 100 मिलियन टन बढ़ गया है.’ तमिलनाडु के कोयंबटूर में प्राकृतिक खेती प्रदर्शनी को याद करते हुए प्रधानमंत्री ने प्राकृतिक खेती अपनाने वाले युवाओं की तारीफ की.

 

उन्होंने कहा, ‘मैं प्राकृतिक खेती पर एक बड़ी कॉन्फ्रेंस में शामिल होने के लिए कोयंबटूर गया था. मैं साउथ इंडिया में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की कोशिशों से बहुत प्रभावित हुआ. बहुत सारे युवा, अत्यधिक योग्य पेशेवर अब प्राकृतिक खेती को अपना रहे हैं.’ इससे पहले 19 नवंबर को पीएम मोदी ने तमिलनाडु के कोयंबटूर में पीएम -किसान सम्मान निधि की 21वीं किस्त लाभार्थियों को जारी की. साथ ही प्राकृतिक खेती प्रदर्शनी का उद्घाटन किया. उन्होंने कोयंबटूर में दक्षिण भारत प्राकृतिक खेती शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया.

उन्होंने स्थानीय किसानों से मुलाकात की, उनसे बातचीत की और प्रदर्शनी देखी. इसमें अलग-अलग खेती के उत्पाद दिखाए गए थे. साथ ही एक कोने में पौधों और फसलों के विकास को भी दिखाई गई थी. तमिलनाडु के गवर्नर आर एन रवि भी प्रधानमंत्री के साथ थे.

दक्षिण भारत प्राकृतिक खेती शिखर सम्मेलन 2025, 19-21 नवंबर तक हुआ. इसका आयोजन तमिलनाडु प्राकृतिक खेती के हितधारकों की ओर से किया गया था. सम्मेलन का मकसद टिकाऊ, पर्यावरण के अनुकूल, रसायन मुक्त कृषि पद्धतियाँ को बढ़ावा देना था. इसके साथ ही पर्यावरण के अनुकूल और रसायन मुक्त कृषि पद्धतियाँ के तरीकों को बढ़ावा और आर्थिक रूप से टिकाऊ मॉडल को अपनाने पर जोर देना था. एक व्यवहार्य के रूप में प्राकृतिक और खेत की खोई उर्वरता को फिर से प्राप्त करने ओर बदलाव को तेज करने पर भी जोर दिया गया.


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